छोटे से इस मकान से,
घने भरे श्मशान से,
हर कब्र को मैं गिन रहा
मैं जुगनुओं को सुन रहा
है रात का खौफ यूं,
मैं मोम सा पिघल रहा
पर अकेला चल रहा
पर अकेला चल रहा

कफ़न की भी क्या जाति है?
कितने चले बाराती है?
मासूम से क्या छीन रहा
मैं साथ कुछ ना दिन रहा
आसमानी तारों में वो
मुझे आज ही से गिन रहा
पर अकेला चल रहा
पर अकेला चल रहा

तारीफों का ऐसा तांता लगा
जैसे हर किसी से नाता लगा
मरके भी वो मुझको छल रहा
मर जाना क्या सफल रहा?
नाम की इस भीड़ में
कोई अपना निर्बल रहा
पर अकेला चल रहा
पर अकेला चल रहा

आज का रंग सफेद है
मेरे जाने का थोड़ा खेद है
रंगो से क्या झलक रहा?
डर के गले वो लग रहा
कांधा देने आगे ना बढ़ा
वो दूर सबसे अलग रहा
पर अकेला चल रहा
पर अकेला चल रहा

मौत का भी मजहब बना
चिता की आग दफन कब्र बना
आग में कैसा मैं झुलस रहा!
दफन सांसों को मैं तरस रहा
बादलों की आड़ में
मैं आंसुओं सा बरस रहा
पर अकेला चल रहा
पर अकेला चल रहा