Poem 7 : पर अकेला चल रहा..

छोटे से इस मकान से, घने भरे श्मशान से, हर कब्र को मैं गिन रहा मैं जुगनुओं को सुन रहा है रात का खौफ यूं, मैं मोम सा पिघल रहा पर अकेला चल रहा पर अकेला चल रहा कफ़न की भी क्या जाति है? कितने चले बाराती है? मासूम से क्या छीन रहा मैं साथ … Continue reading Poem 7 : पर अकेला चल रहा..